The Aesthetics of Tabla Accompaniment - Sri V. Narhari (Author)

वाद्य संगत करते समय तबला वादक के लिए आवश्यक अनुभूतियाँ 

भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला केवल एक लय वाद्य नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदर्शन का आधार और संतुलन भी है। जब एक तबला वादक किसी वाद्य कलाकार (जैसे सितार, सरोद, बांसुरी या वायलिन) के साथ संगत करता है, तब उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। एक उत्कृष्ट तबला संगतकार वही है जो अपने वादन से मुख्य कलाकार को सहारा दे, न कि उसे दबाए। इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिन्हें हर तबला वादक को ध्यान में रखना चाहिए।

 

1. सुनना सबसे महत्वपूर्ण 

संगत का पहला नियम है — सुनना। तबला वादक को मुख्य कलाकार के हर सूक्ष्म भाव, मींड, गमक और लय के बदलाव को ध्यान से सुनना चाहिए। यदि सुनने की क्षमता मजबूत है, तो संगत स्वतः ही सटीक और प्रभावशाली बनती है। बिना सुने केवल बजाना संगत नहीं, बल्कि बाधा बन सकता है।

2. लय की स्थिरता बनाए रखना

तबला वादक का सबसे बड़ा कर्तव्य है लय को स्थिर रखना। चाहे कलाकार कितनी भी जटिल तानों या layakari में जाए, तबला को लय का स्तंभ बनकर खड़ा रहना चाहिए। लय की यह स्थिरता ही पूरे प्रस्तुति को संतुलित रखती है

3. सादगी में सौंदर्य

वाद्य संगत में अत्यधिक जटिलता दिखाने की आवश्यकता नहीं होती। खासकर आलाप और विलंबित गत में तबला को सरल, मधुर और संयमित रहना चाहिए। अनावश्यक तिहाइयाँ या भराव मुख्य कलाकार के भाव को कमजोर कर सकते हैं।

4. मुख्य कलाकार का सम्मान

संगत करते समय यह हमेशा याद रखना चाहिए कि मंच पर मुख्य केंद्र वाद्य कलाकार है। तबला वादक को अपने कौशल का प्रदर्शन इस प्रकार करना चाहिए कि वह कलाकार को उभारने में मदद करे, न कि ध्यान अपनी ओर खींच

5. समय की समझ (टाइमिंग

कब बोल भरना है, कब शांत रहना है, और कब सम पर जोर देना है — यह समझ बहुत जरूरी है। सही समय पर दिया गया एक छोटा सा ‘का’ या ‘धा’ भी पूरे प्रदर्शन को जीवंत बना सकता है।

6. तान और बोलों की संगति

वाद्य कलाकार जब तान या जटिल पैटर्न बजाता है, तब तबला वादक को उसके अनुरूप अपने बोलों का चयन करना चाहिए। इससे एक संवाद (conversation) बनता है, जो श्रोताओं को बेहद आकर्षित करता है।

7. आवाज़ का संतुलन

तबला की ध्वनि मुख्य वाद्य से अधिक नहीं होनी चाहिए। ध्वनि का संतुलन ऐसा हो कि तबला स्पष्ट सुनाई दे, लेकिन वह मुख्य वाद्य को ढक न दे। यह विशेष रूप से माइक्रोफोन के उपयोग के समय महत्वपूर्ण होता है।

8. घराने की शैली का संतुलित उपयोग

हर तबला वादक अपने घराने की विशेषताओं के साथ आता है, लेकिन संगत करते समय उसे लचीला होना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार शैली में बदलाव करना ही एक परिपक्व कलाकार की पहचान है।

9. सम पर सटीक पकड़

सम भारतीय संगीत का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। तबला वादक को हमेशा सम पर सटीक और प्रभावशाली तरीके से पहुंचना चाहिए। यह पूरे प्रदर्शन की ऊर्जा को परिभाषित करता है।

10. संवाद की भावना

संगत केवल साथ बजाना नहीं है, बल्कि यह एक संवाद है। तबला और वाद्य कलाकार के बीच एक अदृश्य बातचीत चलती है। यह संवाद जितना गहरा होगा, प्रस्तुति उतनी ही प्रभावशाली होगी।

11. रचना की समझ

जिस राग और बंदिश या गत को प्रस्तुत किया जा रहा है, उसकी समझ होना आवश्यक है। इससे तबला वादक बेहतर तरीके से संगत कर सकता है और प्रस्तुति के भाव को समझ पाता है।

12. अनुभव और संवेदनशीलता

अंततः संगत एक तकनीकी कौशल के साथ-साथ संवेदनशीलता का भी विषय है। अनुभव के साथ यह समझ विकसित होती है कि कब क्या करना है और कितना करना है।

निष्कर्ष

एक श्रेष्ठ तबला वादक वही है जो अपने वादन से मुख्य कलाकार को सशक्त बनाए, प्रस्तुति में सौंदर्य जोड़े और श्रोताओं को एक संपूर्ण अनुभव प्रदान करे। संगत में विनम्रता, सजगता और संवेदनशीलता ही सफलता की कुंजी है।

लेखक परिच

श्री वी. नरहरी
उपाध्यक्ष – Centre for Research & Promotion of Indian Music (CRPIM)

श्री वी. नरहरी भारतीय कला और सांस्कृतिक परिदृश्य में 25 से अधिक वर्षों की समृद्ध विरासत के साथ एक प्रतिष्ठित आर्टप्रेन्योर, क्यूरेटर, स्क्रिप्ट राइटर और संगीतकार हैं। उनकी विशेषज्ञता और दूरदृष्टि ने इस क्षेत्र पर गहरा प्रभाव डाला है, तथा उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की नीतियों के परामर्श में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

एक बहुआयामी कलाकार के रूप में, श्री नरहरी एक प्रशिक्षित तबला और पखावज वादक हैं, और वे गर्व से फर्रुखाबाद घराने से संबंध रखते हैं, जो ताल वाद्य परंपरा की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित परंपराओं में से एक है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के संरक्षण, संवर्धन और आधुनिक संदर्भों में उसके पुनर्स्थापन के प्रति उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है।

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